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Sunday, March 21, 2010

काल सर्प दोष क्या है



काल सर्प योग का निर्माण ग्रहों की एक विशेष स्थिति के फल स्वरूप होती है
यह स्थिति है , राहू और केतु के बीच एक ओर अन्य सभी सात ग्रहों का आ जाना। जन साधारण में यह एक धारण व्याप्त है की यह एक परम अनिष्टकारी योग है, परन्तु यह एक मात्र भ्रम ही है। इनके बुरे प्रभाव तो होते है , परन्तु इतने भी बुरे नहीं की परम अनिष्टकारी हो। मुख्यतः काल सर्प दोष के कारण जातक को शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है।
कुंडली में काल सर्प दोष होने से जातक की अपेक्षित प्रगति में अर्चने आती है। ऐसा जातक शारीरिक , आर्थिक एवं
मानसिक द्रष्टि से परेशान होता है। यदि बीमार हो तो दवा असर नहीं करती है , कर्ज हो तो जल्दी चुकता नहीं और कलह हो तो शांति प्रदान नहीं होती आदि।
काल सर्प योग का निर्माण:-
जब कुंडली में सभी ग्रह राहू और केतु के बीच आ जाते है तो इस ग्रह स्थिति को काल सर्प योग कहते है।राहू को सर्प का मुख और केतु को उसकी पूछ कहते है। यदि अन्य ग्रह योग बलवान न हो तो जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।
कई बार ऐसा होता होता है की राहू और केतु के मध्य सभी सात ग्रह न आकर एक या एक से अधिक ग्रह बाहर रहते है। ऐसी अवस्था में भी काल सर्प योग की छाया बरकरार रहती है । इसलिए इसे आंशिक काल सर्प योग कहते है।
राहू और केतु हमेशा वक्रीय रहते है, अतः कुंडली में इनकी दिशा घरी की चाल की दिशा में चलती है। परन्तु अन्य ग्रह सामान्यतः घरी की चाल के विपरीत दिशा में गति करते है। अतः अगर समस्त ग्रह , राहू यानि की सर्प के मुख में जाता हुआ प्रतीत हो तो इसे वास्तवीक काल सर्प योग कहते है। इसके विपरीत यदि समस्त ग्रह केतु यानि सर्प के पूछ की ओर जाता प्रतीत हो तो इसे विपरीत काल सर्प योग कहते है।
वास्तवीक योग का प्रभाव अधिक जबकि विपरित योग का अपेक्षाकृत कम होता है।
काल सर्प योग के जातक को राहू, केतु के दशा- अंतरदशा एवं गोचर के दौरान भावो से सम्बंधित कष्ट ज्यादा होता है।

यदि किसी कुंडली में राहू या केतु के साथ अन्य ग्रहों की युति है , तो उन ग्रहों की डिग्री देखि जनि चाहिए। यदि साथ में बैठे ग्रह की डिग्री राहू व् केतु के डिग्री से ज्यादा है तो यह पूर्ण काल सर्प योग नहीं माना जायेगा। यदि राहू और केतु के घेरे से बाहर एक भी ग्रह हो, तो भी यह पूर्ण काल सर्प योग नहीं माना जायेगा।

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