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Friday, March 12, 2010

बालारिष्ट


बालारिष्ट का आर्थ है ,बालक की बारह वर्ष की आयु के पूर्व मृत्यु ,या मृत्यु तुल्य कष्ट। यह कष्ट किसी बीमारी , बालक के माता या पिता की मृत्यु के कारण हो सकता है । बालारिष्ट के मुख्या सिद्धांत -
-चन्द्रमा की स्थिति - बाल्यावस्था में चन्द्रमा की सिथिति सर्वाधिक महत्व पूर्ण होती है । चन्द्रमा का पीड़ित होना बालक और माँ दोनों को के लिए आरिष्ट उत्पन्न करता है । यदि जन्म कुंडली में चन्द्रमा क्रूर गृह के साथ या क्रूर दृष्टि युक्त हो तथा आठवे या बारहवे भाव में बैठा हो तो बालक अल्पायु होता है ।
-लग्न तथा लग्न का स्वामी -किसी भी कुंडली में लग्न तथा लग्नेश का महत्त्व अति महतवपूर्ण है ।लग्न तथा लग्न स्वामी की अच्छी स्थिति किसी भी विपत्ति से सामना करने की शक्ति देता है. यदि लग्न पाप ग्रहों के बीच हो और लग्न से छठे , आठवे और बारहवे भाव में पाप गृह हो तो बालक अल्पायु होता है।

यदि लग्न से आठवे भाव में मंगल ,नवे में सूर्य तथा बारहवे में शनि हो एवं उनपर किसी भी शुभ गृह की दृष्टि न हो तो बालक अल्पायु होता है।
३- अष्टम भाव तथा अष्टां स्वामी- अष्टम भाव पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि अथवा उसके प्रभाव से आयु क्षीण होती है।
परन्तु अष्टम भाव में स्थित मार्गीय शनि आयु में वृद्धि करता है।

४- यदि वक्रीय शनि मंगल की राशी में हो , अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर बलि मंगल की दृष्टि हो , तो अल्पायु योग बनता है।
५- यदि जन्म सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय हुआ हो , जब सूर्य तथा चन्द्र राहू या केतु के समीप हो और लग्न पर शनि तथा मंगल की दृष्टि हो तो अल्पायु योग बनता है।
६- माता को अरिष्ट- चन्द्रमा पर तीन अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो और उस पर और किसी भी शुभ गृह की दृष्टि न हो तो माता को मृत्यु तुल्य कष्ट अथवा उसकी मृत्यु हो सकती है।
७- पिता को अरिष्ट- यदि सूर्य पाप कर्त्री योग में हो अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त हो और अशुभ गृह सूर्य से सप्तम भाव में हो तो पिता की मृत्यु अथवा उसे मृत्युतुल्य कष्ट हो सकता है.

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